there’s me,

दूर आसमान में जब एक तारा टूटा था.. तब मम्मी और पापा की एक मन्नत पुरी हुई.. अप्रैल के आखिरी दिनों में मम्मी के दोनों हाथो में रुई के फोहे सी मैं आ गयी.. तब से लेकर अब तक मम्मी पापा ने हर वो लम्हा सँजोकर रखा है जिसने मुझे कली से फूल बनते देखा है.. मेरी नन्ही मुस्कुराहट हो या फिर गीली आँखों वाली राते.. पलंग के पीछे पापा का मोबाईल छुपाना.. या मम्मी की कंघी से बाल बनाना.. घर की उन सारी चीजों को इधर उधर करना और फिर मम्मी का उन्हें समेटना.. इन्ही लम्हों को कैमरे में कैद कर पापा का इस ब्लॉग पर डालना.. सोचती हूँ जब मैं बड़ी हो जाउंगी.. तो कैसे देखूंगी इस ब्लॉग को.. मेरा पूरा बचपन तो यहाँ बिखरा पड़ा है.. क्या क्या उठाऊंगी और क्या छोडूंगी.. पहली बार जब मुझे मायने समझ आयेंगे इसके.. क्या मैं पापा से लिपट पडूँगी ? या रोउंगी ? या मम्मी के सीने से लगकर घंटो बैठ जाउंगी..

सोचती हूँ.. कितने प्यार से गाँठ लगाकर रखा होगा मम्मी ने मेरे पहले कदम को.. मेरा पहला शब्द अलमारी के किसी कोने में तह किया हुआ मिलेगा.. मेरी किलकारी की गूँज मम्मी के कानो की बालियों में कही ठहरी होगी.. मेरी आँखों का टिमटिमाना जाने कौनसे दस्तावेजो में संभाल के रखा हुआ होगा.. तब मैं क्या महसूस करुँगी.. इतने सारे लोगो का प्यार.. उन लोगो का प्यार जो मुझसे इतने दूर होंकर भी इतने करीब है..

तब मैं मम्मी पापा को सिर्फ शुक्रिया कहूँगी या कुछ और ? अपने उन्ही पलो को खूबसूरती से जीने के लिए मैं अपना पूरा बचपन इतना खुशगवार बना दूंगी कि जब मैं पलट कर पीछे देखू.. तो मुझे वो ही लवी कही मिले जिसने पापा की ऊँगली थाम रखी हो या मम्मी के आँचल से लिपटी खडी हो.. तब तक मैं अपनी जिंदगी की गुल्लक में जमा कर रही हूँ आप सबकी दुआए और प्यार.. एक ना एक दिन वैसे ही लौटाउंगी सब.. जैसे अपनी ही आवाज़ पहाडो से लौट कर आ जाती है.. गूंजती हुई..

तब तक के लिए पापा का बनाया ये ब्लॉग पढ़ते रहिये आप.. मैं तो चली टेबल पर पड़ा उनका चश्मा उठाने..

 आपकी लवी

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