Kids Behaviour आज पढ़िए बच्चों के अच्छे और बुरे बिहेविअर के बारें में प्रियंका सिंह की नवभारत टाईम्स में छपी रिपोर्ट की पांचवीं कड़ी, जो इस विषय के विशेषज्ञों से बातचीत के आधार पर है.

क्या करते हैं पेरेंट्स

सीधा फरमान जारी कर देते हैं कि तुम जो मांग रहे हो, वह तुम्हें नहीं मिलेगा जबकि कई बार बच्चे की मांग जायज भी होती है। अगर साथ में कोई और तो अक्सर बिना सोचे-समझे बच्चे की इच्छा पूरी भी कर देते हैं ताकि उनकी बातचीत में दखल न हो या फिर दूसरों के सामने उनकी इमेज खराब न हो।

क्या करना चाहिए 

  • बच्चे को हमेशा रोकें-टोकें नहीं। हर बात के लिए हां करना गलत है तो न करना भी सही नहीं है। ‘डोंट डू दिस, डोंट टू दैट’ का रवैया सही नहीं है। जो बात मानने वाली है, उसे मान लेना चाहिए। अगर उसकी कुछ बातें मान ली जाएंगी तो वह जिद कम करेगा। मसलन कभी-कभी खिलौना दिलाना, उसकी पसंद की चीजें खिलाना जैसी बातें मान सकते हैं। 
  • ध्यान रहे कि अगर एक बार इनकार कर दिया तो फिर बच्चे की जिद के सामने झुककर हां न करें। बच्चे को अगर यह मालूम हो कि मां या पापा की ‘हां’ का मतलब ‘हां’ और ‘ना’ का मतलब ‘ना’ है तो वह जिद नहीं करेगा। 
  • किसी भी मसले पर मां-पापा दोनों की सहमति होनी जरूरी है। ऐसा न हो कि एक इनकार करे और दूसरा उस बात के लिए मान जाए। अगर एक सख्त है और दूसरा नरम है तो बच्चा फायदा उठाता है। जो बात नहीं माननी, उसके लिए बिल्कुल साफ इनकार करें, जोर देकर करें और दोनों मिलकर करें। अगर घर में बाकी लोग हैं तो वे भी बच्चे की तरफदारी न करें। 
  • उसे कमजोर बनकर न दिखाएं, न ही उसके सामने रोएं। इससे बच्चा ब्लैकमेलिंग सीख लेता है और बार-बार इस हथियार का इस्तेमाल करने लगता है। 
  • यह न कहें कि अगर तुम यह काम करोगे तो हम वैसा करेंगे, मसलन अगर तुम होमवर्क पूरा करोगे तो आइसक्रीम खाने चलेंगे। उससे कहें कि पहले होमवर्क पूरा कर लो, फिर आइसक्रीम खाने चलेंगे। इससे उसे पता रहेगा कि अपना काम करना जरूरी है। ऐसे में फिजूल जिद बेकार है। 
  • बहस की बजाय कई बार समझौता कर सकते हैं कि चलो तुम थोड़ी देर कंप्यूटर पर गेम्स खेल लो और फिर थोड़ी देर पढ़ाई कर लेना। इससे बच्चा दुनिया के साथ भी नेगोशिएट करना सीख जाता है। हालांकि ऐसा हर बार न हो, वरना बच्चे में ज्यादा चालाकी आ जाती है। – यह भी देखें कि बच्चा जिद कर रहा है या आप जिद कर रहे हैं क्योंकि कई बार पैरंट्स भी बच्चे की किसी बात को लेकर ईगो इशू बना लेते हैं। यह गलत है। 

एक्सपर्ट्स पैनल :�
प्रो. अरुणा ब्रूटा, डिपार्टमेंट ऑफ सायकॉलजी, डीयू�
श्यामा चोना, एजुकेशनिस्ट और एक्स-प्रिंसिपल, डीपीएस�
एन. एन. नैयर, प्रिंसिपल, एपीजे स्कूल, नोएडा