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पापा वो तीन पहियों वाली गाड़ी पहले ही ले आये थे. पर अभी तक उसका ज्यादा इस्तेमाल नहीं किया मैंने. मुझे उसके सहारे चलने के बजाय उसमे लगे चर्खियों से खेलना ज्यादा पसंद है. मम्मी-पापा कोशिश करते है मुझे उसमे घुमाने की और मैं भी थोडी देर घूम लेती हूँ (दिल रख लेती हूँ उनका, और क्या ? ).
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पर मुझे उसके बिना खड़े होने का ज्यादा शौक है. मैं ड्रेसिंग टेबल, बेड आदि का सहारा लेकर खड़ी हो जाती हूँ. मम्मी कहती है कि "लवी, कोशिश नहीं करोगी तो कैसे सीखोगी ?" तो आज मैंने भी ठान ही ली कि मम्मी को आज सीधे खड़े होकर दिखा ही देती हूँ..

ये कोशिश तो मैं पहले भी कर चुकी हूँ पर कल बाहर घूमने जाने कि ख़ुशी भी थी तो कुछ ज्यादा ही जोश दिखा दिया और ड्रेसिंग टेबल पर रखी सारी चीजें बिखेर दी मैंने.

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मम्मी भी कहने लगी, "अब कैसे संभालूं इनको." ये भी कोई बात हुई क्या, अब खुद ही कहती है कि कोशिश करो. अब कोशिश के साथ साथ थोडी मस्ती भी तो करुँगी ना ?
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कल मम्मी और नानी को डॉक्टर के पास भी जाना था तो उन्होंने मुझे तैयार कर दिया. और आपको तो पता ही है कि मुझे कैसे पहले ही पता चल जाता है की आज हमें बाहर जाना है.

डॉक्टर के क्लीनिक से निकलने के बाद हम घूमने भी गए. कहाँ गए ?? अगली बार बताउंगी.
 
मेरे पिछले पोस्ट पर अनिल कान्त अंकल, "काफी विद कुश" वाले कुश अंकल, आदित्य के पापा रंजन अंकल, मिष्टी दीदी के पापा नीरज अंकल, हरकीरत आंटी, हरियाणा वाले ताऊ और "उड़न तश्तरी" वाले समीर अंकल ने कहा था कि "इतना सुन्दर स्विमिंग पूल है तो फिर क्यूँ रोना?"

अंकल अब मैं नहीं रोती. वो उस दिन नया नया था ना तो थोडी झिझक थी.